तपोवन। उत्तराखण्ड विकास पार्टी के उपाध्यक्ष पूरण सिंह भंडारी ने गढ़वाली कुमाऊँनी भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग की।
पूरण सिंह भंडारी ने कहा कि गढ़वाली कुमाऊँनी भाषायें अपने आप में समृद्ध हैं। प्रसिद्ध भाषा विद डॉक्टर त्रिलोचन पांडे ने उच्चारण, ध्वनि तत्व और रूप रचना के आधार पर कुमाऊनी को चार वर्गों में बांट कर उसकी 12 प्रमुख बोलियां निर्धारित की हैं।
1. पूर्वी कुमाऊंनी वर्ग: कुमय्या , सौर्याली , सीराली, असकोटी।
2. पश्चिमी कुमाऊंनी वर्ग: खस पराजिया , पछाई, फल्दाकोटी, चौगरखिया, गंगोई, दनपुरिया
3. उत्तरी कुमाऊंनी वर्ग : जौहारी , भोटिया
4. दक्षिणी कुमाऊंनी वर्ग: रचभैंसी (नैनीताल की कुमाऊंनी)

चंपावत के चंद राजा थोर अभयचंद का 989 ईo का कुमाऊंनी भाषा में लिखा हुआ ताम्रपत्र से पता चलता है कि दसवीं सदी में कुमाऊंनी राज भाषा के रूप में प्रतिष्ठित थी।
कुमाउंनी भाषा का विकास दरद, खस, पैशाची व प्राकृत से हुआ है कुछ विद्वान शौरसेनी अपभ्रंश से इसका विकास मानते हैं।
पंडित बद्रीदत्त पांडे ने कुमाऊंनी का विकास दस्यु, खस, शक, हूंण, आर्य आदि सभी जातियों के मिश्रण से माना है। इस भाषा में कोल किरात व अरबी फारसी और अंग्रेजी के शब्द भी जुड़ गये हैं। जैसे अदालत, इनाम, ऐब, किताब अरबी फारसी के शब्द हैं और कुड़ी, गिज, गंड., जुड आदि शब्द कोल किरात के हैं और मोटर कार डॉक्टर अंग्रेजी शब्द हैं।
पूरण सिंह भंडारी ने कहा कि भाजपा कांग्रेस गढ़वाली कुमाऊँनी भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल करने से डर रही हैं।