लैंसडौन। उत्तराखण्ड विकास पार्टी ने लैंसडौन का नाम बदले जाने का विरोध करते हुए कहा कि गढ़वालियों के कृतज्ञ होने की भावना का प्रतीक है लैंसडौन, इसकी महत्ता झूठे छलकपटी और कृतघ्न लोग नहीं समझ सकते।
उत्तराखण्ड विकास पार्टी के अध्यक्ष मुजीब नैथानी ने कहा कि गढ़वालियों के खून में देशप्रेम, शौर्य और साहस का प्रतीक है गढ़वाल राइफल्स। उन्होंने कहा कि यदि अंग्रेजों ने गढ़वाल राइफल्स का गठन न किया होता तो आज विश्वस्तर पर गढ़वालियों की जो पहचान और धमक है वो न होती। गढ़वाल राइफल्स भारत की सबसे नई रेजीमेंटों में से एक है जिसकी स्थापना अंग्रेजों ने सन 1887 में की थी।
उन्होंने कहा कि गढ़वाल राइफल्स के गठन से पूर्व गढ़वालियों को दूसरी पलटनों में शामिल होने में बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था, व उस समय विभिन्न पलटने चूंकि देश/जाति आधारित होती थी ऐसे में अन्य पलटनों में गढ़वालियों को उनकी मेहनत का वो फल नहीं मिलता था जिसके वो हकदार होते थे।
मुजीब नैथानी ने कहा कि वीर भड़ बलभद्र सिंह नेगी अपनी योग्यता और साहस की वजह से देश के जंगी लाट (आज के जमाने के सेना के जनरल) के एडीसी के पद से सेवानिवृत्त हुए थे और उस समय के जंगी लाट रॉबर्ट्स से उन्होंने गढ़वालियों की एक अपनी पलटन बनाने का अनुरोध किया था, जिसके क्रम में लाट सूबेदार बलभद्रसिंह नेगी की तारीफ करते हुए जंगी लाट रॉबर्ट्स ने लिखा था कि, जिस देश में बलभद्र सिंह नेगी जैसे वीर योद्धा पैदा होते हैं, उस देश को अपनी एक पलटन मिलनी चाहिए। मगर वायसराय सशंकित थे कि इतने छोटे से देश में एक पलटन खड़ी करने लायक सैनिक मिल भी पायेंगे! तो लाट सूबेदार बलभद्र सिंह नेगी द्वारा उन्हें व्यक्तिगत आश्वासन दिया गया कि, यदि गढ़वाल राइफल्स की स्थापना की जाती है, तो पलटन खड़ी करने लायक सैनिक वो लाकर देंगे, जिसके बाद ही गढ़वाल रेजिमेंट के गठन का रास्ता साफ हुआ और गढ़वालियों ने प्रथम विश्व युद्ध तक पूरी दुनिया में अपनी धमक जमा कर दो विक्टोरिया क्रॉस और रॉयल गढ़वाल का खिताब और रॉयल रेड रोप प्राप्त की ।
मुजीब नैथानी ने कहा कि गौरमतलब है कि भारत में किसी अन्य रेजिमेंट को रॉयल का खिलाब नहीं मिला, यह खिताब केवल गोरखा राइफल्स को मिला जो नेपाल की है।
उन्होंने कहा कि अंग्रेजों द्वारा गढ़वालियों के शौर्य साहस और वीरता को उजागर करने के कारक गढ़वाल राइफल्स की स्थापना के कारण, उन अंग्रेजों के प्रति अपनी कृतज्ञता का भाव प्रकट करने और बताने कि गढ़वाली किसी के द्वारा किए गए किसी अहसान को नहीं भूलते हैं, अंग्रेजों द्वारा बनाये गए रेजिमेंटल सेंटर का नाम तत्कालीन वायसराय लैंसडौन के नाम पर लैंसडौन रखा। उन्होंने कहा कि जैसे अग्रेजों का बैगपाइपर हमारा घरया मशक बीन बन चुका है जिसके बिना गढ़वाली मांगलिक कार्यों की कल्पना भी नहीं की जा सकती है, लैंसडौन नाम भी आज टोटल घरया गढ़वाली नाम बन चुका है।
उन्होंने कहा कि जिस राज्य की अपनी कोई सेना नहीं है, उस राज्य के नेता गढ़वालियों के शौर्य और साहस के इतिहास को मिटाने के लिए लैंसडौन नाम बदलना चाहते हैं, जो अग्निवीर जैसी कुल्हाड़ी की तरह की गढ़वालियों की आजीविका के साथ साथ पहचान पर हमला है और सच्चे और वीर गढ़वाली अपने पूर्वजों द्वारा प्रकट किए गए सम्मान का अपमान नहीं होने देंगे।